हमारे प्रेरणास्रोत — श्रद्धेय श्री गौरीशंकर राय जी

Shradhey Shri Gauri Shankar Rai Ji — Freedom Fighter & Founder Inspiration

श्री गौरीशंकर राय (मित्रों के बीच गौरी)

एक संघर्षमय प्रगतिशील व्यक्तित्व

जन्म
बाबू राजकुमार राय व बाबू महादेव राय के घर, 10 जून 1924 को करनई, बलिया (उ०प्र०)
माता-पिता
कैलाशी देवी, श्री रमाशंकर राय
विवाह
जून 1941, श्रीमती रामदुलारी के साथ
मृत्यु
2 मई 1991, करनई, बलिया (उ०प्र०)
शिक्षा
  • प्राथमिक शिक्षा — करनई व अपायल गाँव की पाठशाला
  • मिडिल स्कूल — सुखपुरा
  • हाईस्कूल — मेस्टन स्कूल, बलिया
  • स्नातक शिक्षा — आगरा विश्वविद्यालय
  • बी०एड० — काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
  • साहित्य रत्न — हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
अध्यापन
बलिया के टाउन विद्यालय में अध्यापन (1952 के पूर्व)
राजनीतिक जीवन
आचार्य नरेन्द्र देव, जय प्रकाश नारायण, अशोक मेहता आदि समाजवादियों के सम्पर्क के कारण पूर्ण कालिक जन सेवा एवं राजनीति का वरण।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी (1942)विधायक, बलिया (1957)उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार (1964)सदस्य विधान परिषद (1967)सांसद, गाजीपुर (1977)संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में संबोधन (1978)

वैचारिक स्तंभ — चार गुरु-परम्पराएँ

  • आचार्य नरेन्द्र देव

    मर्यादा एवं शुचिता

    संसदीय एवं वैचारिक जीवन में गरिमा, संयम और उच्च नैतिक प्रतिमानों का पालन।

  • डॉ० राम मनोहर लोहिया

    संघर्षशीलता एवं समता

    शोषितों, पीड़ितों और सर्वहारा वर्ग के हक के लिए निर्भीक और त्वरित संघर्ष।

  • लोकनायक जयप्रकाश नारायण

    मर्यादित क्रान्तिकारिता

    सम्पूर्ण क्रान्ति के अप्रतिम सिपाही; सत्ता-लिप्सा से सदैव दूर रहकर लोक-चेतना का निर्माण।

  • चौधरी चरण सिंह

    माटी एवं ग्रामीण अनुराग

    किसानों, मजदूरों और गाँव की मिट्टी से जीवन की अंतिम सांस तक अटूट भावनात्मक जुड़ाव।

परिचय के दो शब्द

वे सूर्य जैसे प्रकाश देने वाले और फूल जैसे सुगन्ध बिखरने वाले लोगों में से थे। वे अडिग सिद्धान्तवादी थे—टूटना पसन्द करते थे किन्तु झुकना नहीं।

— राष्ट्र गौरव श्रद्धेय श्री गौरीशंकर राय जी
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

क्रान्तिकारी भूमि का उद्भव (1850–1950)

वर्ष 1850 से 1950 तक का कालखण्ड बलिया जनपद के जन जीवन का स्वर्णयुग रहा जिसमें ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया जिन्होंने भारतीय राजनीति, हिन्दी साहित्य, राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति को न केवल नई दिशा दी बल्कि सामाजिक मूल्यों एवं आदर्शों का कलेवर ही बदल डाला।

अजेय ब्रितानी हुकूमत को घुटने टेकने के लिए विवश कर बलिया ने 1942 में अपने को पराधीन भारत का पहला स्वतंत्र जनपद घोषित कर दिया। इन्हीं क्रान्तिकारी तरुणों में से एक थे छात्रनेता गौरीशंकर राय, जो आजीवन शोषितों, पीड़ितों और वंचितों की मुखर आवाज बने रहे।

साहस एवं रणनीति

आपातकाल में भूमिगत प्रतिरोध (1975)

1975 में आपातकाल के दौरान जब देश के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारियाँ हो रही थीं और राय साहब के पीछे भी MISA का वारंट था, तब उन्होंने जेल की सुख-सुविधाओं के बजाय भूमिगत होकर प्रतिरोध का कठिन मार्ग चुना।

वेश बदलते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के शहरों व देहातों में घूम-घूम कर उन्होंने आंदोलन में प्राण फूंके। उनका लखनऊ आवास जन संघर्ष समन्वय समिति और छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गुप्त केंद्र बना रहा। गुप्त बुलेटिनों का प्रकाशन और चौधरी चरण सिंह सहित विपक्षी नेताओं के बीच समन्वय उनकी दिलेरी का प्रमाण था।

भाषा एवं लोक संस्कृति

सांस्कृतिक संचेतना एवं भाषाई महारथ

राय साहब बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू लिखने व बोलने में उन्हें अद्भुत महारथ प्राप्त थी। वे जितनी उत्कृष्ट और साहित्यिक भोजपुरी बोलते व लिखते थे, उतनी अच्छे-अच्छे साहित्यकार भी नहीं कर पाते।

वे विनोदी, सहृदय और जिन्दादिल इंसान थे। उनके भाषण क्रान्तिकारी विचारों से ओतप्रोत होते हुए भी सदैव मृदु, चुटीले और मर्यादित रहते थे। 1978 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हिन्दी में भाषण देकर उन्होंने वैश्विक मंच पर राष्ट्रभाषा का मान बढ़ाया।

त्याग एवं निष्काम कर्म

राजनीतिक शुचिता एवं "राजनीतिक राष्ट्रीय संत"

राय साहब राजनीति में धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण के घोर विरोधी थे। वे टूटना पसंद करते थे किन्तु सिद्धांतों से झुकना नहीं। स्वतंत्रता सेनानी के नाते मिले उप पुलिस अधीक्षक (DSP) पद और नैनीताल की 50 एकड़ कृषि भूमि को उन्होंने सहर्ष यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि जिसे आवश्यकता हो उसे दें।

उन्होंने कभी व्यक्तिगत धन संग्रह नहीं किया और न ही उन पर कभी परिवारवाद या पुत्रवादी होने का आरोप लगा। समाज ने उन्हें श्रद्धापूर्वक "राजनीतिक राष्ट्रीय संत" की उपाधि दी, जिनकी सादगी और निष्काम सेवा आने वाली पीढ़ियों का पथ आलोकित करती रहेगी।

जीवन-यात्रा

🌱1940

भारत स्काउट्स तथा आर्य वीर दल के कार्य में रुचि, चरखा तथा अन्य रचनात्मक कार्यों में रूझान, स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य।

1941

परिवार के दबाव में विवाह।

✊1942

नवीं कक्षा के छात्र के रूप में भारत छोड़ो आन्दोलन में छात्रों के जुलूस का नेतृत्व, 14 अगस्त को गिरफ्तारी व 18 अगस्त को जिला जेल, बलिया का फाटक खुलने पर रिहाई, उसके उपरान्त पुनः फरारी। विद्यालय से निष्कासन।

महात्मा गांधी के कार्यक्रमों का कार्यान्वयन, प्रचार और उ०प्र०/बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वदेशी और चरखा का प्रचार।

1945

जिला छात्र कांग्रेस के अध्यक्ष, प्रदेश छात्र कांग्रेस की कार्यसमिति के सदस्य।

1946

जिला कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य चन्द्रशेखर, काशी नाथ मिश्र जैसे छात्र नेताओं को लेकर छात्र आंदोलन को नई दिशा व पुनः शिक्षा प्रारम्भ।

🇮🇳1947

स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद छात्र आन्दोलन का नेतृत्व व जेल यात्रा।

1948

आचार्य नरेन्द्र देव व जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकारिणी के सदस्य।

1949

सोशलिस्ट पार्टी के प्रदेशीय मंत्री। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण उ०प्र० शासन द्वारा नैनीताल में आवंटित 50 एकड़ जमीन लेने से इनकार।

स्नातक स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण शासन द्वारा उप पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्ति की पेशकश पर सधन्यवाद अस्वीकृति।

1950

नगर पालिका बलिया के चुनाव में पुराने मठाधीशों को परास्त कराने में नया कीर्तिमान।

प्रारम्भ से ही समाजवादी विचारधारा, प्रखर वक्ता, गरीबो व पिछड़ो के हिमायती।

किसान, मजदूर व छात्र आंदोलन में सक्रिय तथा शिकमी आन्दोलन का नेतृत्व।

1951

टाउन विद्यालय में अध्यापन।

🗳️1952

बलिया विधान सभा क्षेत्र से, सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में, चुनाव में कुछ सौ मतो से पराजित।

अध्यापन कार्य से अलग।

1954

असम और नागालैण्ड में उ०प्र० निवासी गरीब मजदूरों पर चल रहे दमन चक्र के विरोध में संघर्ष। छः माह से अधिक समय के असम प्रवास के दौरान आंदोलन का सफल नेतृत्व।

🏛️1957

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर, बलिया विधान सभा क्षेत्र से विधान सभा सदस्य निर्वाचित।

आगरा विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य।

विधान सभा में बाबू त्रिलोकी सिंह, नारायण दत्त तिवारी, गेंदा सिंह के साथ सशक्त विपक्षी की भूमिका।

विधान सभा में महत्वपूर्ण विषयों तथा संवैधानिक मुद्दो पर विशेष रूचि।

देश में पहली बार, याचिका के माध्यम से, लोक महत्व का प्रश्न उठाने के सदस्य के अधिकार का विधान सभा में सदुपयोग।

1960

रसड़ा में चीनी मिल स्थापित करने का मामला विधान सभा में उठाया। अन्ततः 1969 में केन्द्र सरकार द्वारा चीनी मिल की स्थापना हेतु स्वीकृति।

1964

अशोक मेहता के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल।

🤝1966

श्रीमती सुचेता कृपालानी (मुख्यमंत्री) के राजनीतिक सलाहकार के रूप में दायित्व निर्वाह।

🏆1969

विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित उ०प्र० में संयुक्त विधायक दल की सरकार के अधिकृत उम्मीदवार को सीधे मुकाबले में पराजित किया। यह राय साहब की व्यक्तिगत उपलब्धि थी क्योंकि कांग्रेस पार्टी विपक्ष में थी और उसके सदस्य बहुत कम थे।

मोती लाल मेमोरियल सोसाइटी व भारत सेवा संस्थान के सदस्य।

कांग्रेस के बटवारे के बाद कांग्रेस संगठन में प्रदेश कांग्रेस महामंत्री।

विधान परिषद की सार्वजनिक कारोबार समिति के सदस्य।

सदस्य प्राविधिक शिक्षा परिषद।

कांग्रेस (इंदिरा गुट) के प्रखर आलोचक।

📢1974

विधान परिषद में नेता विरोधी दल। इस कार्यकाल में पहली बार मीडिया में विधान परिषद को अधिक महत्व।

जय प्रकाश आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और नेतृत्व। इनके लखनऊ आवास पर जन संघर्ष समन्वय समिति उ०प्र० व छात्र युवा संघर्ष समिति का मुख्यालय था।

🏃1975

आपातकाल की घोषणा के साथ फरारी। लखनऊ आवास पर कई बार छापे।

तत्पश्चात् भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व, आन्तरिक सुरक्षा कानून के अन्तर्गत वारंट। घर की चल सम्पत्ति की कुर्की।

आपातकाल की फरारी में वाराणसी, कानपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, इलाहाबाद, दिल्ली, पटना, बक्सर, कलकता, अहमदाबाद, बड़ौदा, बम्बई आदि स्थानों पर रहकर आंदोलन को गतिमान रखा।

गुप्त बुलेटिनो व समाचार पत्र का प्रकाशन।

चौधरी चरण सिंह व अन्य नेताओं के बीच सम्पर्क सूत्र का कार्य।

🗳️1977

लोकसभा के चुनाव गाजीपुर से जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा सदस्य निर्वाचित।

लोक लेखा समिति सहित संसद की समितियों के सदस्य।

लोकसभा सदस्य के अल्पकालीन अवधि 36 बार महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर दिशा निदेशक भाषण।

इन्दिरा गाँधी के विरुद्ध ऐतिहासिक विशेषाधिकार हनन का सवाल उठाया। भारत के जाने माने संवैधानिक विशेषज्ञों के राय के विरूद्ध अपने सवाल पर डटे रहे तथा अन्त में विजय। यह विशेषाधिकार का मामला अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व का था।

आपात काल में नजरबंदो की रिहाई, इंदिरा गाँधी की सदस्यता समाप्ति, पूर्वांचल के पिछड़ेपन, शाह आयोग की रिपोर्ट, किसानों विशेषकर गन्ना किसानों की समस्याओं और चीनी नीति, व विदेश नीति पर अनेक ऐतिहासिक व्याख्यान।

🌐1978

हांगकांग, सिंगापुर, जापान, साउथ कोरिया, ब्रिटेन, कनाडा, स्वीट्जरलैण्ड, अमेरिका तथा अन्य यूरोपीय देशो की यात्रा।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का प्रतिनिधित्व।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतिहास में पहली बार हिन्दी में भाषण। महासभा को हिन्दी में सम्बोधित करने वाले मात्र दो सदस्यों में श्री राय के अतिरिक्त तत्कालीन विदेशमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी थे।

राष्ट्र संघ की महासभा व उसकी विभिन्न समितियों में दक्षिण अफ्रीका के राजनीतिक बंदियों, परमाणविक रेडिएशन के मानवजीवन पर प्रभाव, वाह्यअन्तरिक्ष का शान्तिपूर्ण प्रयोग, फिलीस्तीनी और इजरायली समस्याए तथा राष्ट्र संघ के विभिन्न कार्यक्रमों पर करीब एक दर्जन प्रभावपूर्ण भाषण।

उ०प्र० गन्ना किसान संघ के अध्यक्ष।

जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य।

⚖️1984

राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे पर जनतापार्टी के नेतृत्व से टकराव, पटना सम्मेलन का बहिष्कार तथा जनता पार्टी से सम्बन्ध विच्छेद।

सैद्धान्तिक मुद्दो पर कभी कोई समझौता नहीं। आजीवन विपक्षी नेता की छवि तथा तेवर।

लाइब्रेरी के लगातार प्रयोग के हिमायती। अध्ययन इनकी विशेष रूचि। बाद में लोक दल व जनता दल से सम्बन्ध।

अनेक शिक्षण संस्थाओं से सम्बन्ध। खेसारी के उपयोग और उत्पादन के सम्बन्ध में उ०प्र० शासन के आदेश के विरूद्ध गाजीपुर में किसानों का आंदोलन।

स्मृति में संस्था

श्रद्धेय श्री गौरीशंकर राय जी के सपने तथा सृजनात्मक विचार को मूर्त रूप देते हुए, उनकी स्मृति में 10 मई 1999 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वर्षगांठ के अवसर पर उनके पैतृक गाँव करनई (वर्तमान में गौरीशंकर पुरम्), जनपद बलिया (उ०प्र०) में गौरीशंकर राय कन्या महाविद्यालय की नींव रखी गई।

वर्ष 2001 में कला एवं विज्ञान संकाय में स्नातक कक्षाओं का शुभारंभ हुआ; आज यह महाविद्यालय कन्या शिक्षा, गुणवत्ता और मूल्य-आधारित शिक्षा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का जीवंत स्मारक है।

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